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अपने परिवार की इच्छाओं के विरूद्ध एक नवयुवती 'सिया', हाल ही में एल एल. बी. की पढ़ाई में, स्नातक हुई। इस चुनौतीपूर्ण कानून के पेशे में, बिना किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि के वह, उन विभिन्न अवसरों को तलाश
यह पुस्तक भारतीय संदर्भ में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा लाई जाने वाली संभावनाओं तथा भारतीय उद्योगों और अर्थव्यवस्था पर AI के प्रभावों को केंद्र में रखकर लिखी गई है। पुस्तक की शुरुआत यह बताने के साथ होती है कि किस तरह से AI क्षेत्र में विभिन्न देशों के वर्चस्व की दौड़ ने तेज गति पकड़ रखी है और कैसे AI मुख्यधारा की राजनीति और विश्व के नेताओं को प्रभावित करने में कामयाब है। पुस्तक का एक अध्याय CEO और CTO द्वारा अपनी प्राथमिकताओं की सूची में AI को शीर्ष पर रखने के लिए प्रेरित करने के लिए समर्पित है। खेल क्षेत्र में AI के उपयोग, खेल प्रेमियों के साथ-साथ स्पोर्ट्स और कंप्यूटर गेम्स के क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों के लिए अत्यंत रुचिकर साबित होने जा रहे हैं। इसके साथ ही यह पुस्तक ऑटोनोमस वाहनों, स्मार्ट होम्स और साइबर सुरक्षा के क्षेत्रों में AI के उपयोगों के बारे में गहन चर्चा और विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
प्रारंभिक भारत मध्य आशियाशी संबंध आणि शुंग-सातवाहन काळ, दक्षिण भारतातील प्रारंभिक इतिहास, उत्तर भारत गुप्त साम्राज्य आणि हर्षवर्धन, प्रादेशिक राज्य संक्षिप्त इतिहास या चार पाठांद्वारे विद्यार्थ्याना प्राचीन भारताचा एक समृद्ध कालखंड समजू शकेल असा विश्वास आहे. हा अभ्यासक्रम नेमण्याचे विद्यापीठाचे उद्दिष्ट म्हणजे प्रारंभिक भारताचा इतिहास हा एकूणच भारतीय इतिहासाचा अतिशय महत्त्वाचा भाग आहे. कारण तो संपूर्ण भारतीय इतिहासाचे योग्य आकलन करण्यासाठी मूलाधार आहे. हा विषय विद्यार्थ्यांना प्राचीन इतिहासाचे आकलन होण्याच्या उद्देशाने तयार केलेला आहे. भारतीय सभ्यता आणि संस्कृती तसेच राजकीय घराणी यांच्या उदय आणि विकासाला कारणीभूत असणाऱ्या घटकांवर प्रकाश टाकण्याचा प्रयत्न केलेला आहे.
क्या हमारा सारा जीवन ही इस वो तो नहीं की संभावना से प्रेरित हुआ नहीं लगता! मन की अनिश्चित, असंगत, अकसर टेड़ी, उलझन मे डालने वाली चालो और उड़ानों पर भटकती होती है जिंदगी। 'है या नहीं 'के दो पाटो के बीच पीसते रहने को विवश। अक्सर वो तो नहीं की छांव मे थोड़ा शुकुन पाती हुई! पर अगर मगर के चक्कर सब कुछ गडमड सा लगता हुआ। कही वो तो नहीं, कहीं ये तो नहीं! इन दो धुरियों मे घुमता ही रहता है। जीवन चक्र! कैसा संयोग! कैसे रंग है जीवन के! जब जीना चाहा, जब प्यार चाहा, मिला नहीं। जिसके लिए सब कुछ छोड़ कर उसका होना चाहा, वो भी नहीं हो पाया। । जिसे भी चाहा मिला नहीं। और जब प्यार और खुशियाँ मिली भी तो अब! जब जीवन ही दांव पर लगा है। ऐसा लगता हुआ कि सब कुछ खत्म होने वाला है। आज एकाएक उसी जीवन से मोह सा हो गया! जब मृत्यु पास आती दिखी अभी तो जिंदगी जी ही नहीं है! बहुत कुछ करना, देखना है और जीते जाना है....जब सब ओर मौत और विनाश का तांडव हो रहा होता। जब ऐसे बुरे फंसे हैं, चारो तरफ पानी। बाढ़ का पानी, बादल फटने की जल राशि मे जीवन अंत होना करीब तय सा लगता हुआ। तब जीने की इच्छा बढ़ती जाती। जैसे जीने की बढ़ती इच्छा और आसन्न मृत्यु के बीच कोई गहरा संबंध हो!
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